
सिस्टम की संवेदनहीनता: ऑक्सीजन देने से किया मना, रेफर सेंटर पहुँचते ही बुझ गया घर का चिराग।
डॉक्टर साहिबा का 'नो ऑक्सीजन' फरमान, मासूम की मौत का जिम्मेदार कौन?
अजीत मिश्रा (खोजी)
।। बस्ती: जीवन रक्षक या जीवन भक्षक? विक्रमजोत CHC में लापरवाही ने बुझाया घर का चिराग ।।
उत्तर प्रदेश।
बस्ती। जनपद के विक्रमजोत सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्र (CHC) से मानवता को शर्मसार कर देने वाली घटना सामने आई है। जिस अस्पताल की दहलीज पर एक परिवार नई खुशियों की उम्मीद लेकर पहुँचा था, वहाँ डॉक्टर की कथित लापरवाही और संवेदनहीनता ने एक मासूम की जान ले ली। यह घटना केवल एक चिकित्सा विफलता नहीं, बल्कि हमारी सरकारी स्वास्थ्य व्यवस्था के मुँह पर एक करारा तमाचा है।
क्या है पूरा मामला?
मिली जानकारी के अनुसार, राजमंगल कनौजिया नामक व्यक्ति ने अपनी पत्नी को प्रसव के लिए सुबह 8 बजे विक्रमजोत CHC में भर्ती कराया था। दोपहर करीब 12:50 पर एक बच्ची का जन्म हुआ। लेकिन खुशियों का यह पल ज्यादा देर नहीं टिका। डॉक्टरों ने बच्ची की स्थिति गंभीर बताते हुए उसे रेफर कर दिया।
पीड़ित पिता का आरोप है कि जब एम्बुलेंस कर्मियों ने ऑक्सीजन की आवश्यकता के बारे में पूछा, तो डॉ. साजिया खातून ने स्पष्ट रूप से मना कर दिया कि ऑक्सीजन की कोई जरूरत नहीं है। लेकिन जब मासूम को उच्च केंद्र ले जाया गया, तो वहाँ के डॉक्टरों ने बच्ची को मृत घोषित करते हुए फटकार लगाई कि “बिना ऑक्सीजन के इसे यहाँ क्यों लाए?”
सवालों के घेरे में संवेदनहीनता
इस हृदय विदारक घटना ने कई गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं:
- क्या एक डॉक्टर को इतनी सामान्य जानकारी नहीं थी कि नवजात को ऑक्सीजन की जरूरत पड़ सकती है?
- क्या सरकारी अस्पतालों में तैनात डॉक्टरों के लिए मरीजों की जान केवल एक ‘आंकड़ा’ बनकर रह गई है?
- आखिर कब तक इस तरह की लापरवाही के कारण गरीब परिवार अपनी गोद उजड़ते देखेंगे?
सिस्टम की जवाबदेही कहाँ?
राजमंगल कनौजिया जैसे साधारण व्यक्ति के लिए उसका बच्चा उसकी पूरी दुनिया थी। आज उस परिवार पर जो गुजर रही है, उसकी भरपाई कोई सरकारी मुआवजा या जाँच कमेटी नहीं कर सकती। एक तरफ सरकार स्वास्थ्य सेवाओं को बेहतर बनाने के बड़े-बड़े दावे करती है, वहीं दूसरी तरफ फील्ड पर तैनात डॉक्टरों की ऐसी लापरवाही उन सभी दावों की पोल खोल देती है।
👉प्रोटोकॉल का उल्लंघन: नवजात को रेफर करते समय ‘रेफरल स्लिप’ पर ऑक्सीजन की आवश्यकता का उल्लेख न करना मेडिकल प्रोटोकॉल की बड़ी चूक है। क्या एम्बुलेंस कर्मियों के बयान दर्ज किए गए हैं? यह इस मामले में सबसे बड़ा साक्ष्य हो सकता है।
👉अधीक्षक की भूमिका: इस पूरे प्रकरण पर सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्र (CHC) के अधीक्षक और जिले के मुख्य चिकित्सा अधिकारी (CMO) का क्या पक्ष है? क्या उन्होंने कोई जांच कमेटी गठित की है?
👉पुराना रिकॉर्ड: क्या संबंधित डॉक्टर या इस केंद्र के खिलाफ पहले भी ऐसी लापरवाहियों की शिकायतें आई हैं? इसे जोड़कर आप सिस्टम की निरंतर विफलता को दर्शा सकते हैं।
निष्कर्ष: अब कार्रवाई की दरकार
यह केवल एक व्यक्ति की शिकायत नहीं है, बल्कि उस डर की आवाज़ है जो हर आम आदमी सरकारी अस्पताल जाते समय महसूस करता है। प्रशासन को चाहिए कि डॉ. साजिया खातून और इस लापरवाही में शामिल अन्य दोषियों पर कड़ी से कड़ी कार्रवाई की जाए। जब तक जवाबदेही तय नहीं होगी, तब तक इसी तरह मासूमों की बलि चढ़ती रहेगी और “स्वास्थ्य केंद्र” केवल “मृत्यु केंद्र” बनकर रह जाएंगे।

















